नास्तिक


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Categories : ATHEIST
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नास्तिक होने का अर्थ सिर्फ ‘ईश्वर को ना मानना’ नहीं है बल्कि जो मनुष्य किसी सर्वशक्तिमान पर विश्वास करने के बजाय स्वयं पर विश्वास करता हो, यथार्थवादी हो, तार्किक हो, एवं प्राचीन धार्मिक मान्यताओं को चुनौती देने की हिम्मत कर सकता हो नास्तिक कहलाता है|

                      धर्म मनुष्य को गुलाम बनाने का जरिया है | असल में धर्म व ईश्वर की अवधारणा मनुष्य के स्वार्थ एवं डर से जुडी हुई है| मनुष्य जितना अधिक स्वार्थी व् डरपोक होगा , धर्म और ईश्वर में उसका विश्वास उतना ही अधिक होगा और यही विश्वास मनुष्य को धार्मिक गुलामी की ओर ले जायेगा| धार्मिक गुलामी मनुष्य को तर्कहीन बना देती है|

                      जब भी मनुष्य अपने जीवन कि समस्याओं में उलझ जाता है और अपनी समझ से समस्याओं को नहीं सुलझा पाता तो वह अपनी समस्याओं को ईश्वर कि इच्छा मानकर अपना सिर झुका लेता है (इसी सिर झुकाने को लोगों ने श्रद्धा का नाम दिया है)| बचपन से ही हमें बताया जाता है कि ईश्वर सर्वशक्तिमान है सम्पूर्ण श्रष्टि का रचियता ईश्वर ही है हमारे जीवन जो कुछ भी हो रहा है और भविष्य में जो कुछ भी होगा , सब कुछ ईश्वर कि इच्छा से ही होगा | बचपन में हम तर्क करने के लायक नहीं होते लेकिन जब हम तर्क करने लायक होते हैं तब तक ईश्वर नाम का डर हमारे मन में घर कर चुका होता है | हम इतन डर चुके होते हैं कि ईश्वर के अस्तित्व पर सवाल उठाना तो छोडिये ईश्वर के प्रति कुछ बुरा सोचने से भी डरते हैं | हम ये मान लेते हैं कि सिर्फ ईश्वर के पास ही हमारी सभी समस्याओं का समाधान है| हम ईश्वर की शरण में जाते हैं उससे प्रार्थना करते हैं और दोबारा कोशिश करते हैं| सफलता मिलने पर ईश्वर के प्रति हमारा विश्वास और भी दृढ हो जाता है लेकिन असफलता मिलने पर हम निराश हो जाते है | हमें लगता है कि ईश्वर हमसे नाराज़ है हम ये जानना नहीं चाहते कि हमारी कोशिश में कहाँ कमी रही बल्कि हम दोबारा ईश्वर की शरण में चले जाते हैं | बार बार असफलता मिलने पर हम अंदर से पूरी तरह टूट जाते हैं ऐसी स्तिथि हम ईश्वर से नाराज़ होकर खुद को नास्तिक मानना शुरू कर देते हैं (ऐसे लोग वास्तव में नास्तिक नहीं बन पाते )  या अपनी समस्या को ईश्वर की इच्छा मानकर कोशिश करना बंद कर देते हैं| सफलता मिले या असफलता दोनों ही स्थितियों में हमारा आत्मविश्वास कमजोर होता है| सफलता मिलने पर हमें लगता है कि ईश्वर ने मेरी समस्या को सुलझाया है तथा असफलता मिलने पर ईश्वर कि इच्छा मान लेना हमारे आत्मविश्वास ओ कमजोर करता है| अपनी कमजोरियों पर पर्दा डालने के लिये मनुष्य को ईश्वर रुपी पर्दा मिल जाता है और मनुष्य ईश्वर को ही सर्वशक्तिमान मान लेता है|

“यदि आप ईश्वर को सर्वशक्तिमान मानते हैं, ईश्वर के सामने मनुष्य को सिर्फ मिट्टी का पुतला मात्र समझते हैं तो यकीन मानिए आपके अंदर का आत्मविश्वास पूरी तरह से मर चुका है”

                  यदि कोई मनुष्य अहंकार या ईश्वर के प्रति किसी गुस्से के कारण ईश्वर पर विश्वास नहीं करता तो वह वास्तव में नास्तिक नहीं है क्योकि नास्तिकता तर्क पर आधारित है और जहाँ अहंकार होता है वहां तर्क नहीं होता | अहंकार का एक ही कारण हो सकता है , स्वयं को ईश्वर का प्रतिद्वंदी समझना या स्वयं को ईश्वर| ऐसी स्थिति में मनुष्य ईश्वर के अस्तित्व को नकारता नहीं है, वो भी कहीं न कहीं मानता है कि ईश्वर है|  वास्तव में ईश्वर का अस्तित्व सिर्फ मानने से ही है यदि आप ईश्वर को मानते हैं तो वो आपके लिये सब कुछ है अगर नहीं मानते तो कुछ भी नहीं| ईश्वर इतना कमजोर है कि वो सिर्फ आपके मानने से ही जिन्दा है|

क्या ईश्वर सर्वशक्तिमान और दयावान है?

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