वर्ण व्यवस्था कर्म आधारित है या जन्म आधारित?


0
Spread the love

 

“मनुस्मृति” हमेशा से विवादित विषय रहा है| जिसमें सबसे अधिक विवाद का विषय रहा है “वर्ण व्यवस्था का आधार”| मनुस्मृति के अनुसार वर्ण व्यवस्था कर्म आधारित है या जन्म आधारित? मनुस्मृति को देव वाणी बताने वाले वर्ण व्यवस्था को कर्म आधारित बताते है| उनके अनुसार जो ज्ञानी है जिसे चारों वेदों का ज्ञान है, वह ब्राह्मण है| जो बलशाली है, दूसरों की रक्षा करने में सक्षम है, वह क्षत्रिय है| जो धनवान है, वह वैश्य है और जो व्यक्ति शिल्प कला का ज्ञानी है वह शूद्र कहलाता है| तो वही मनुस्मृति को बुरा कहने वाले जन्म आधारित बताते है| लेकिन दोनों में से कोई भी प्रमाण प्रस्तुत नहीं करता| दोनों प्रकार के लोग कुछ चुनिन्दा श्लोक के आधार पर अपनी बात को सही साबित करने की कोशिश करते हैं|

मनुवादियों के द्वारा वर्ण व्यवस्था को कर्म आधारित साबित करने के लिये मनुस्मृति के श्लोक 10:65 (अध्याय 10, श्लोक 65) का उदाहरण दिया जाता है| जिसमें कहा गया है – “जैसे शूद्र ब्राह्मणत्व को और ब्राह्मण शूद्रता को प्राप्त होता है उसी प्रकार क्षत्रिय और वैश्य से उत्पन्न शूद्र भी क्षत्रियत्व और वैश्यत्व को प्राप्त होता है|” इस श्लोक में किस प्रकार से शूद्र ब्राह्मणत्व को तथा ब्राह्मण शूद्रत्व को प्राप्त होता है स्पष्ट नहीं किया गया है| इस श्लोक का सही अर्थ जानने के लिये श्लोक 10:64 (अध्याय 10, श्लोक 64)को समझने की आवश्यकता है| जिसमें कहा गया है – “ब्राह्मण से शूद्र (शूद्र जाति के स्त्री में) उत्पन्न कन्या यदि ब्राह्मण के साथ ब्याही जाए और आगे भी यही क्रम रहे तो वह अपनी सातवीं पीढ़ी में अपनी नीच योनि से उद्धार पाकर ब्राह्मण हो जाति है|” उक्त दोनों श्लोकों में उत्पन्न होने के बाद वर्ण परिवर्तन होने की बात कही गयी है ना कि ज्ञान प्राप्त करके वर्ण परिवर्तन हो रहा है| उक्त दोनों श्लोकों से यही स्पष्ट हो रहा है कि वर्ण व्यवस्था जन्म आधारित है|

कर्म आधारित वर्ण व्यवस्था को एक उदाहरण से समझने की कोशिश करते हैं| वर्तमान में सभी बालकों को प्राथमिक शिक्षा एक समान दी जाती है| प्रत्येक बालक अपनी रूचि के आधार पर यह निर्णय लेता है कि उसे भविष्य में इंजीनियर बनना है, सेना में जाना है या शिक्षक बनना है| इसी प्रकार क्या पूर्व में भी शूद्र परिवार में जन्मे बालक को भी उन सभी बालकों (जो द्विजातिय परिवार में जन्मे हैं) के समान उनकी रूचि व काबिलियत जानने के लिये युवावस्था तक हर प्रकार का प्रशिक्षण दिया जाता था ताकि यह पता चल सके कि उस बालक की रूचि किस क्षेत्र (ज्ञान, युद्ध कला, व्यापार कला या सेवा कार्य) में है? क्या उन सभी बच्चों को उनकी रूचि के आधार पर ही उनको आगे का प्रशिक्षण दिया जाता था? क्या उन सभी को दिए गए प्रशिक्षण के आधार पर उनकी सही काबिलियत जान कर ही यह निर्णय लिया जाता था कि वह किस वर्ण से सम्बंधित होगा?

मनुस्मृति के श्लोक 02:150 ( अध्याय 2, श्लोक 150) में कहा गया है कि “वैदिक जन्म को दने वाला और धर्म की शिक्षाओं से शासन करने वाला ब्राह्मण का लड़का भी धर्म से वृद्ध का पिता होता है|” इस श्लोक में ध्यान देने वाली बात ये है कि इसमें ब्राह्मण के लड़के को वृद्ध का पिता बताया गया है| क्या यह एक प्रकार की जन्म आधारित श्रेष्ठता नहीं है? जब भी इस श्लोक पर सवाल उठाया जाता है तो मनुवादियों के द्वारा यह तर्क दिया जाता है कि ब्राह्मण का लड़का इसलिये श्रेष्ठ है क्योंकि वह धर्म की शिक्षाओं से शासन करता है, वह ज्ञानी है| अब अध्याय 2 के श्लोक 135 पर ध्यान देते हैं जिसमें कहा गया है कि “दस वर्ष का ब्राह्मण और सौ वर्ष का क्षत्रिय दोनों को पिता पुत्र समझना चाहिए, दोनों में ब्राह्मण पिता के सामान है|” क्या दस वर्ष का बालक सौ वर्ष के किसी व्यक्ति से अधिक ज्ञानी हो सकता है? क्या दस वर्ष के बालक को इतने कम समय में इतना ज्ञान या प्रशिक्षण दिया जा सकता है कि वह सौ वर्ष के व्यक्ति से अधिक ज्ञानी हो जाए? उक्त दोनों श्लोकों के अर्थ पर ध्यान दिया जाए तो ऐसा प्रतीत होता है कि ब्राह्मण का लड़का सिर्फ इसलिए श्रेष्ठ है क्योंकि उसका जन्म ब्राह्मण परिवार में हुआ है|

असल में वर्ण व्यवस्था का कर्म से कोई सम्बन्ध नहीं है| वर्ण व्यवस्था जन्म आधारित है ना कि कर्म आधारित| मनुस्मृति के श्लोक 2:155 (अध्याय 2, श्लोक 155) पर ध्यान दीजिये| जिसमें वर्ण व्यवस्था को जन्म आधारित बताया गया है| श्लोक 2:155 में कहा गया है कि “ज्ञान से ब्राह्मणों का , बल से क्षत्रियों का , धन धान्य से क्षत्रियों का और जन्म से शूद्रों का बड़ापन होता है|”  इस श्लोक में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि शूद्रों का बडापन जन्म से होता है| कर्म से शूद्रों का कोई सम्बन्ध नहीं है|

 

रामचरित मानस में भी वर्ण व्यवस्था का वर्णन किया गया है| रामचरित मानस के अनुसार वर्ण व्यवस्था कर्म आधारित है या जन्म आधारित इस विषय पर अलग लेख में विश्लेषण करेंगे| फिलहाल चलते चलते रामचरित मानस के अरण्यकांड के दोहा 33 चौपाई 1 बताते चलें| जिसमें कहा गया है-

“सापत ताडत परुष कहंता| बिप्र पूज्य अस गावहिं संता||

पूजिअ बिप्र सील गुन हीना| सूद्र न गुन गन ग्यान प्रबीना||”

“श्राप देता हुआ, मारता हुआ और कठोर वचन कहता हुआ ब्राह्मण भी पूजनीय है, ऐसा संत कहते हैं| शील और गुण से हीन भी ब्राह्मण पूजनीय है| गुणगणों से युक्त और ज्ञान में निपुण भी शूद्र पूजनीय नहीं है|”

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *