मनुस्मृति


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मनुस्मृति हिन्दू धर्म का प्राचीन धर्म शास्र है| इसे मनुसंहिता के नाम से भी जाना जाता है| ऋषि मुनियों के द्वारा सभी वर्णों संकीर्ण जातियों के पूर्व के अनुसार जैसी धर्म व्यवस्था  के बारे में जानने के लिये मनु से आग्रह किया गया था| यह मनु के द्वारा ऋषि मुनियों के आग्रह पर उपदेश के रूप में दिया गया था| मनुस्मृति के अनुसार समस्त मानव जाति को चार वर्णों (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शुद्र) में विभाजित किया गया है| मनुस्मृति के अनुसार ब्राह्मण श्रेष्ठ है और शुद्र नीच| मनुस्मृति 12 अध्यायों में विभाजित है| इसके पहले अध्याय में स्रष्टि की रचना व चार वर्ण व उनके पेशों के बारे में वर्णन है| दूसरे अध्याय में ब्रह्मचर्य और अपने मालिक की सेवा के बारे में वर्णन है| तीसरे अध्याय में शादी विवाह के रीति रिवाजों के बारे में वर्णन है| चौथे अध्याय में गृहस्थ जीवन जीने के नियमों का उल्लेख है| पांचवे अध्याय में महिलाओं के कर्तव्य और उनके चरित्र के बारे में उल्लेख किया गया है| छटे अध्याय में संत के कर्तव्यों का उल्लेख है| सातवें अध्याय में राजा के कर्तव्यों का उल्लेख किया गया है| आठवें अध्याय में अपराध व न्याय का वर्णन है| नौवें अध्याय में पैतृक संपत्ति के बारे में उल्लेख किया गया है| दसवें अध्याय में वर्णों के मिश्रण का उल्लेख है| ग्यारह वे अध्याय में पापकर्म का उल्लेख किया गया है| बारहवें अध्याय में वेदों की प्रसंशा का वर्णन है|

मनुस्मृति को लेकर समाज दो धडों में बंटा नज़र आता है| एक मनुस्मृति के समर्थक जो मनुस्मृति को देव वाणी मानते हैं, मनु को भगवान के समान दर्जा देते हैं और चाहते हैं कि मनुस्मृति की प्रत्येक बातों का पालन प्रत्येक व्यक्ति के द्वारा किया जाए तथा संविधान की जगह मनुस्मृति को लागु किया जाए क्योंकि मनुवादी लोग समाज के संचालन के लिये  मनुस्मृति को एक आदर्श व्यवस्था मानते हैं| दूसरे वे लोग जो मानते हैं कि मनुस्मृति के द्वारा शूद्रों का हजारों वर्षों तक शोषण किया गया| मनुस्मृति में ऐसे ऐसे नियम बनाये गए जिनके द्वारा शूद्रों का शोषण किया गया|  वर्तमान की जातिय व्यवस्था वर्ण व्यवस्था का ही विकसित रूप है जो कि वर्ण व्यवस्था से ज्यादा घातक है| डॉ आंबेडकर अपनी किताब “ फिलॉसफी ऑफ़ हिंदूइस्म” में लिखते हैं, “मनु ने चार वर्ण व्यवस्था की वकालत की थी| मनु ने इन चार वर्णों को अलग अलग रखने के बारे में बताकर जाति व्यवस्था की नींव रखी थी| हालाँकि ये नहीं कहा जा सकता कि मनु ने जाति व्यवस्था की रचना की है| लेकिन उन्होंने इस व्यवस्था के बीज जरुर बोये थे|” मनुस्मृति के विरोध के रूप में डॉ आंबेडकर ने अन्य लोगों के साथ सामूहिक रूप से मनुस्मृति का दहन किया था|

मनुवादी लोग मनुस्मृति को आदर्श दंड विधान मानते हैं|  एक ही प्रकार के अपराध के लिये सवर्णों ( विशेषकर ब्राह्मणों के लिए) के लिये अलग सजा का प्रावधान है और शूद्रों के लिये अलग| कुछ अपराध तो ऐसे हैं जिसमे सज़ा के तौर पर शूद्रों के शरीर के निजी अंगों को पूर्ण रूप से खंडित किया जाता है लेकिन लेकिन ब्राह्मणों को कोई सजा नहीं दी जाती| जिस मनुस्मृति में एक ही अपराध के लिये सवर्णों और शूद्रों के लिये अलग अलग सज़ा का प्रावधान हो वो आदर्श दंडविधान कैसे हो सकता है? मनुस्मृति के अनुसार महिलाये पुरुषों की गुलाम है| सभी वर्णों( ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र) के पुरुषों को महिलाओं के ऊपर विशेषाधिकार प्राप्त हैं| मनुस्मृति के अनुसार शुद्र ब्राह्मणों के गुलाम हैं और शुद्र परिवार की महिलाएं शूद्र पुरुषों की गुलाम हैं| एक प्रकार से महिलाएं “गुलामों की गुलाम” हैं| पुरुष जैसा चाहे वैसा उसके साथ व्यवहार कर सकता है|

मनुवादी मनुस्मृति के कुछ चुनिन्दा श्लोकों का उदाहरण देकर मनुस्मृति की खूबसूरती दिखाने की कोशिश करते हैं| मनुस्मृति द्वारा शूद्रों और महिलाओं को दिए गए अधिकारों की बात करते हैं| लेकिन क्या किसी भी चीज़ का एक पहलु देख कर अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि वो चीज़ अच्छी है या बुरी? किसी भी चीज को परखने के लिये उसके दोनों पहलुओं को देखा जाना अति आवश्यक होता है| अगर आप एक पहलू को जानकार ही इस निष्कर्ष पर पहुँच जाए कि वो चीज़ अच्छी है या बुरी है, तो इसका मतलब आप उसके साथ न्याय नहीं कर रहे हैं| साथ ही आपकी न्यायिक प्रवृत्ति पर भी सवाल खड़ा होता है| मनुवादी लोग भी मनुस्मृति का सिर्फ एक ही पहलू दिखाते हैं और जो मनुस्मृति का दूसरा पहलू दिखाने की कोशिश करते हैं उन्हें धर्म विरोधी कह कर समाज से बहिष्कार करने की कोशिश की जाती है|

किसी भी चीज के बारे में किसी भी निष्कर्ष पर पर पहुँचने से पहले उसके बारे में सम्पूर्ण विश्लेषण करना अति आवश्यक होता है| चुनिन्दा तथ्यों के आधार पर निष्कर्ष निकालना एक प्रकार से बेमानी होती है| मनुवादी तथा मनुवाद का विरोध करने वालों के साथ भी यही समस्या है| दोनों ही अपने हिसाब से तथ्यों को पेश करके उसे अच्छा या बुरा बताने की कोशिश करते हैं| सबसे बेहतर निष्कर्ष तभी निकल सकता है जब दोनों प्रकार के तथ्यों को पेश किया जाए तथा दोनों तथ्यों के विश्लेषण के पश्चात् मनुस्मृति को अच्छा या बुरा बताया जाए|

वर्ण व्यवस्था कर्म आधारित है या जन्म आधारित?

1 comment on “मनुस्मृति

    Xyz

    • June 26, 2020 at 2:34 pm

    यहां आदमी जाति से श्रेष्ठ होना चाहता है । कर्म और सोच से तो अपाहिज ही है। जिस वर्ग को मनु स्मृति में लाभ दिखता है वह मनु स्मृति से अपने आप को महान सिद्ध करता है । सोच से तो जानवर ही है । मानवता तो मनुस्यो में होती है , जानवरो में तो मनुहुसियत होती है। जो लोग आज मनुस्मृति से चलना चाहते है वे
    बाबर और अकबर के समय में कहा चले गए थे । इस मनुस्मृति वाली सोचने जाने कितनी बार देश को गुलाम बनवाया है कभी मुगलों तो कभी अंग्रेजो के हाथो । ये सोच इस देश का दुर्भाग्य है।
    कहीं फिर भारी न पड़ जाए । क्यों की इस समय हम उस ओर ही चल पड़े है जिस ओर इस किताब की नींव रखी गई थी । कुछ चंद लोगों ने अपना आधिपत्य स्थापित करने के लिए एक बहुत बड़े वर्ग को पंगु बना दिया है । या फिर कहे गुलाम बना लिया है ।
    आज से कुछ वर्ष पहले पढ़ने और पढ़ाने पर एक ही वर्ग का आधिपत्य था, और जिसका आधार था जाति । जो कि उसी वर्ग तक सीमित था । जो मन में आया लिख डाला , क्यों की लिखने बाला भी बही था और पढ़ने बाला भी बही ,बाकी तो सिर्फ सुनने वाले ही थे, और हर मनुस्य की फितरत है कि अपने बारे में अच्छा लिखना और दूसरों से अच्छा सुनना सो वही किया गया है इसमें। और बाकी पर यह पाखंड रूपी ज्ञान थोप दिया गया है जो की आज तक ढो रहे है । और ऊपर से भगवान रूपी डर बिठा दिया गया बाकी सभी वर्गो में । जिससे कि इसका कोई विरोध न कर सके। वो तो अंग्रेजो का सुक्रिया करो कि पड़ने का अधिकार दिला गए सबको । अन्यथा आज भी चप्पल चटका रहे होते।

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