नास्तिकता व धर्म के प्रति भगत सिंह के विचार


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अधिकांश लोग भगत सिंह को सिर्फ एक जोशीले क्रांतिकारी के रूप में जानते है| लेकिन भगत सिंह एक बहुत बड़े विचारक भी थे| भगत सिंह ईश्वर में विश्वास नहीं रखते थे| भगत सिंह के साथियों का मानना था कि भगत सिंह अपने अहंकार के कारण नास्तिक बने हैं तथा भगत सिंह के कुछ विरोधियों का मानना था कि भगत सिंह की नास्तिकता मार्क्स और लेनिन के बारे में पढ़ कर अपनाई हुई नास्तिकता है| उनके द्वारा जेल में एक लेख लिखा गया था- “मै नास्तिक क्यों हूँ” जिसे पढ़ कर आपको अहसाह हो जायेगा कि भगत सिंह कि नास्तिकता किसी से उधार नहीं ली गयी थी बल्कि उनकी नास्तिकता तर्क पर आधारित थी| भगत सिंह के इस लेख के पीछे का मुख्य कारण एक स्वंतत्र सेनानी बाबा रणधीर सिंह थे, जो लाहौर की उसी जेल में बंद थे जिसमे भगत सिंह थे| बाबा रणधीर सिंह धार्मिक प्रवृत्ति के थे| ईश्वर में उनका विश्वास अटूट था| जब उन्हें पता चला कि भगत सिंह ईश्वर में विश्वास नहीं रखते तो उन्होंने जेल में भगत सिंह से मिलकर उन्हें समझाने का प्रयास किया लेकिन वे असफल रहे | असफल होने के बाद उन्होंने भगत सिंह को बहुत कुछ कह दिया | भगत सिंह ने उस वक़्त कुछ नहीं कहा, लेकिन बाद में उन्होंने पत्र के माध्यम से अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की| एक तरफ जहाँ हिन्दू महासभा सिर्फ हिन्दुओ के लिये और मुस्लिम लीग सिर्फ मुस्लिमों के हक की बात करती थी | वही दूसरी तरफ भगत सिंह का मानना था कि यदि हम धर्म को अलग कर देते हैं तभी सभी भारतीय राष्ट्र के मुद्दे पर एक हो सकते हैं| ईश्वर और धर्म के प्रति भगत सिंह के क्या विचार थे ? आइये जानते हैं–

 

 

1. दो ही रास्ते सम्भव हैं। या तो मनुष्य अपने को ईश्वर का प्रतिद्वन्द्वी समझने लगे या वह स्वयं को ही ईश्वर मानना शुरू कर दे। इन दोनों ही अवस्थाओं में वह सच्चा नास्तिक नहीं बन सकता। पहली अवस्था में तो वह अपने प्रतिद्वन्द्वी के अस्तित्व को नकारता ही नहीं है। दूसरी अवस्था में भी वह एक ऐसी चेतना के अस्तित्व को मानता है, जो पर्दे के पीछे से प्रकृति की सभी गतिविधियों का संचालन करती है। मैं तो उस सर्वशक्तिमान परम आत्मा के अस्तित्व से ही इनकार करता हूँ।

2. अहंकार भी मेरे स्वभाव का अंग है।

3. यह मेरा अहंकार नहीं है, मेरे दोस्त! यह मेरे सोचने का तरीका है, जिसने मुझे नास्तिक बनाया है।

4. चरत सिंह ने भगत सिंह के कानों में फुसफुसाकर वाहे-गुरु से प्रार्थना करने को कहा। वे हँसे और बोले, ‘‘सारी जिदंगी तो मैंने कभी प्रार्थना नहीं की। सच तो यह है कि बहुत बार गरीबों के दुःख देखकर मैंने ईश्वर को गालियाँ दी हैं। अब अगर में उससे क्षमा माँगूगा तो वह कहेगा कि यह एक बुजदिल है, जो अपना अंत देखकर माफी माँग रहा है।

5. बच्चे से यह कहना कि ईश्वर ही सर्वशक्तिमान है, मनुष्य कुछ भी नहीं, मिट्टी का पुतला है-बच्चे को हमेशा के लिए कमजोर बनाना है। उसके दिल की ताकत और उसके आत्मविश्वास की भावना को ही नष्ट कर देना है।

6. मैं कोई शेखी नहीं बघारता कि मैं मानवीय कमजोरियों से बहुत ऊपर हूँ। मैं एक मनुष्य हूँ और इससे अधिक कुछ नहीं। कोई भी इससे अधिक होने का दावा नहीं कर सकता। एक कमजोरी मेरे अंदर भी है। अहंकार मेरे स्वभाव का अंग है।

7. इनसान की धीरे-धीरे कुछ ऐसी आदतें हो गई हैं कि वह अपने लिए तो अधिक अधिकार चाहता है, लेकिन जो उनके मातहत हैं,उन्हें वह अपनी जूती के नीचे ही दबाए रखना चाहता है।

8. जब तक हम अपनी तंगदिली छोड़कर एक न होंगे, तब तक हममें वास्तविक एकता नहीं हो सकती।

9. अगर धर्म को अलग कर दिया जाए तो राजनीती पर हम सब एक हो सकते हैं| धर्म में चाहे अलग अलग ही क्यों न हों|

10. अगर हमें सरकार बनाने का मौका मिला तो किसी के पास प्राइवेट प्रॉपर्टी नहीं होगी सबको काम मिलेगा और धर्म व्यक्तिगत विश्वास की चीज होगी सामूहिक नहीं|

11. बुराई इसलिए नहीं बढ़ रही है कि बुरे लोग बढ़ गए हैं बल्कि बुराई इसलिए बढ़ रही है क्योकि बुराई सहन करने वाले लोग बढ़ गए हैं|

12. सब इंसान समान हैं तथा न तो जन्म से कोई भिन्न पैदा हुआ और न कार्य विभाजन से। एक आदमी गरीब मेहतर के घर पैदा हो गया है, इसलिए जीवन भर मैला ही साफ करेगा और दुनिया में किसी तरह के विकास का काम पाने का उसे कोई हक नहीं है, ये बातें फिजूल हैं।

13. कष्टों से भागना कायरता है|

14. यदि आप ईश्वर को सर्वशक्तिमान मानते हैं, ईश्वर के सामने मनुष्य को सिर्फ मिट्टी का पुतला मात्र समझते हैं तो यकीन मानिए आपके अंदर का आत्मविश्वास पूरी तरह से मर चुका है|

15. धर्म और ईश्वर को मानवता के लिये सबसे निकृष्ट मानता हूँ|

16. इस देश में जो नौजवान ईश्वरवादी है, मेरी नज़र में नामर्द है|

1 comment on “नास्तिकता व धर्म के प्रति भगत सिंह के विचार

    Parkash

    • March 20, 2020 at 5:25 pm

    Bilkul sahi kaha ji

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