धार्मिक अन्याय


dharmik anyay
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    यदि आप सामाजिक न्याय, आर्थिक न्याय, और राजनैतिक न्याय कि अभिलाषा रखते हैं तथा साथ ही आप धार्मिक प्रवृत्ति के हैं तो आपके द्वारा न्याय कि उम्मीद करना बेमानी है| क्योकि सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक अन्याय का आधार धर्म ही है|

                न्याय का अर्थ है भेदभाव ना होना| लेकिन क्या कोई ऐसा धर्म  है जो धर्म, जाति, लिंग, नस्ल, संस्कृति या आर्थिक स्थिति के आधार पर भेदभाव ना करना सिखाता हो? जवाब है, नहीं| जब से धर्म के खिलाफ लोगों ने आवाज़ उठाना शुरू किया है तब से धर्म के ठेकेदार धर्म को नए रूप में परिभाषित करने की कोशिश करने लगे हैं| वो धर्म को विज्ञानं से जोड़ते हैं, धर्म को न्याय से जोड़ने की कोशिश करते हैं | धर्म को एक प्रकार की न्यायिक व्यवस्था बताते हैं | उनका मानना है कि धर्म के अनुसार ही मनुष्य को उसके अच्छे बुरे कर्मो का फल मिलना चाहिए | पर क्या धर्म में न्यायिक गुण है?

                सामाजिक अन्याय –  जिस समाज में धर्म, जाति, लिंग, नस्ल, या संस्कृति के आधार पर भेदभाव न किया जाए, सामाजिक न्याय कहलाता है| कोई भी धर्म कभी भी इंसानियत का हितेषी नहीं रहा| हिन्दू धर्म के अनुसार मनुष्य को चार वर्णों में बांटा गया है – ब्राह्मण , क्षत्रिय , वैश्य और शुद्र| ब्राह्मण सबसे श्रेष्ठ और शुद्र सबसे नीच| हिन्दू धर्म ग्रंथो के अनुसार शुद्रो को शिक्षा ग्रहण का अधिकार नहीं था ना ही अच्छे कपडे पहन सकते थे और ना ही उस कुंए से पानी पी सकते थे जहाँ से कोई सवर्ण पानी पीता हो| मनुस्मृति के अनुसार यदि एक ही पाप किसी ब्राह्मण और शुद्र ने किया है तो उनको मिलने वाली सजा अलग अलग होगी| जो धर्म एक ही पाप के लिये जाति देखकर अलग अलग सजा तय करता हो वो धर्म न्याय कैसे कर सकता है? इस्लाम भी इसी प्रकार का धर्म है | इस्लाम में भी इसी प्रकार कि एक जातीय व्यवस्था है| इस्लाम में यदि कोई इन्सान किसी अन्य धर्म की अच्छाई करता है या धर्म और अल्लाह को मानने से इंकार करता है तो उसे काफ़िर घोषित कर दिया जाता है| इन दोनों ही धर्मो में महिलाओ की स्तिथि अत्यंत दयनीय है |

                आर्थिक अन्याय – आर्थिक असमानता व्यक्तियों की आय के अंतर को दर्शाता है| धर्म ने इसी अंतर को बढाया है| गीता में लिखा है “कर्म करो, फल कि चिंता मत करो| ईश्वर आपके कर्मो के अनुसार फल देगा “| एक मेहनतकश इन्सान मेहनत करने के बाद फल कि चिंता क्यों ना करे ? क्या कोई काल्पनिक ईश्वर इन्सान को उसके किये हुए काम के बदले  में उसे मजदूरी दे सकता है?  मान लीजिये कोई मजदूर किसी जमीदार के खेतों में काम करता है| अपनी मेहनत से खेत को जोतता है, अपने पसीने से खेत को सींचता है| दिन रात मेहनत करके फसल उगाता है| जब उसे उसके काम के बदले मजदूरी देने की बात आती है तो क्या उसे काल्पनिक ईश्वर से मजदूरी मांगनी चाहिए या जिसके लिये काम किया है उससे? बेशक आप कहेंगे कि वो जमींदार ही उस मजदूर को मजदूरी देगा लेकिन धर्म के अनुसार उस मजदूर को अपना कर्म करके अपनी मजदूरी मांगने के बजाय काल्पनिक ईश्वर से उम्मीद करनी चाहिए कि काल्पनिक ईश्वर आकर उसे उसकी मजदूरी देगा| मजदूर को कोई अधिकार नहीं है कि वह उस जमीदार से अपनी मजदूरी मांगे जिसके लिये उसने काम किया है| धर्म का काम है, समाज में आर्थिक असमानता बनाये रखना क्योकि जब तक कोई भी व्यक्ति आर्थिक रूप से कमजोर रहेगा तब तक वह अपने अधिकारों के लिये लड़ने के बजाय यह सोचता रहेगा कि अपने परिवार की मूल जरूरतों को कैसे पूरा करना है|

               राजनैतिक अन्याय – कोई भी राज्य तभी खुशहाल और संपन्न माना जा सकता है जब उस राज्य में सामाजिक भेदभाव और आर्थिक असमानता कम से कम हो तथा यह भेदभाव तभी कम हो सकता है जब नीति निर्माण में सभी समुदाय के लोगों कि भागीदारी हो| | किसी भी देश के नीति-निर्माता सामाजिक भेदभाव और आर्थिक असमानता को ध्यान में रख कर ही नीतियां को बनाते हैं| किसी भी लोकतान्त्रिक देश का संविधान किसी भी व्यक्ति को उस देश के सबसे बड़े संवैधानिक पद पर पहुँचा कर नीति निर्माता बना सकता है| एक आम इन्सान निति निर्माताओं से सवाल कर सकता है| क्या धर्म में भी ऐसा प्रावधान है? नहीं| धर्म ने मनुष्य को जाति के आधार पर श्रेष्ठ और नीच में बाँट दिया है| जो श्रेष्ठ है वो नीतिया बनाएगा|  अब जरा सोचिये, जो व्यक्ति जन्म से श्रेष्ठ है क्या वो चाहेगा कि जन्म से नीच व्यक्ति समाज में उसके बराबर के ओहदे पर पहुंचे? क्या धर्म किसी नीच व्यक्ति को अपने समाज के भले के लिये नीतियाँ बनाने जी इजाजत देता है?

               वास्तव में सभी धार्मिक ग्रंथो में एक मनुष्य के द्वारा, दुसरे मनुष्य का शोषण करने का तरीका लिखा हुआ है| जब कोई सवाल करता है तो तथाकथित जन्म से श्रेष्ठ व्यक्ति कहते हैं कि ये ईश्वर कि वाणी है, इस पर सवाल उठाना मतलब ईश्वर पर सवाल उठाना है| मनुष्य के मन में काल्पनिक ईश्वर का डर इतना अधिक है कि वह अपने हक़ के लिये आवाज़ नहीं उठा सकता और वह काल्पनिक ईश्वर के डर से अपने स्वाभिमान के साथ समझौता कर लेता है|

धर्म और ईश्वर को मानवता के लिये सबसे निकृष्ट मानता हूँ – भगत सिंह 

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